विश्व मे 1970 के दशक के अंत में सर्वप्रथम गर्भ में लिंग परीक्षण तकनीकि का विकास हुआ, तभी से गर्भ परीक्षण उपरांत गर्भपात कराने का सिलसिला चल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति एक ’स्वच्छ क्रूरता‘ है। जनांकिकीय संकेतक इस तथ्य की ओर इशारा करते है कि भारत वर्ष प्रतिवर्ष करोड़ो कन्याओं की भ्रूण हत्या की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
विश्व के सबसे खराब लिंगानुपात वाले क्षेत्रों में दक्षिण-पूर्व एशियन देश खासतौर पर भारत एवं चीन आते है। ये क्षेत्र महिला अधिकारो के प्रति उल्लंधन के लिए भी जाने जाते है। अल्ट्रासाउण्ड स्कैनिंग, अमीनोसेन्टेसिस और विट्रो फर्टीलाइजेशन द्रारा गर्भावस्था के दौरान लिंग पहचान की तकनीकि ने इस स्थिति को और बदतर बना दिया है। कोई भी नैतिक विचार या सिद्वान्त लिंग परीक्षण की इस प्रक्रिया का समथर्न नही करता है।
शासन की परस्पर विरोधी विभिन्न नीतियाॅ और महिला अधिकारों के प्रति अज्ञानता ने इस स्थिति के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। भारत वर्ष में प्रसव पूर्व गर्भ जाॅच के संबंध मे प्रचलित कानून को कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है साथ ही चिकित्सीय क्षे़त्र मे जुड़े लोगो की प्रवृत्ति में भी बदलाव की जरूरत है।
सम्पूर्ण वैश्विक समाज में महिला हत्या विभिन्न रूपों में सदैव मौजूद रही है किन्तु भारतीय समाज मे महिला हत्या के क्रूरतम तरीके जैसे दहेज हत्या अथवा सती प्रथा प्रचलित है। वर्तमान प्रचलित कन्या भ्रूण हत्या महिलाओं के प्रति हिंसा की क्रूरतम अभिव्यक्ति है। कन्या जन्म से बचने के लिए गर्भावस्था के दौरान ही लिंग की पहचान कर कन्याओं की भ्रूण हत्या की जा रही है। कन्या भ्रूण हत्या के कारण भारत वर्ष की जनसंख्या में भी प्रतिवर्ष 35 से 40 लाख लड़कियों की कमी हो रही है । बेतहाशा कन्या भ्रूण हत्या के कारण भारत वर्ष के कुछ हिस्सों में लिंगानुपात गिरकर 800 से कम रह गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस स्थिति पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है।
20 वीं सदी के प्रारम्भ से ही भारत वर्ष में लिंगानुपात निरंतर लड़कों के पक्ष में बढ़ रहा है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में देखा जा सकता है। सर्वप्रथम 1970 के अंतिम वर्षो मे इन्हीं राज्यों में गर्भ मे लिंग परीक्षण केन्द्रों की स्थापना हुई और कन्या भू्रण हत्या का प्रचलन आरम्भ हुआ। चिंताजनक बात यह है कि यह प्रचलन ग्रामीण की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में अधिक है। ग्रामीण की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में तथा अनपढ़ की अपेक्षा शिक्षित महिलाओं में इस प्रचलन का पाया जाना इस मिथक को तोड़ता है कि केवल प्राथमिक शिक्षा के प्रसार तथा महिला जागरूकता द्वारा लिंग भेद समाप्त किया जा सकता है।